ऋग्वेद (मंडल 9)
आ प॑वस्व मदिन्तम प॒वित्रं॒ धार॑या कवे । अ॒र्कस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म् ॥ (४)
हे अतिशय नशीले एवं क्रांत-कर्म वाले सोम! तुम पूजा के योग्य इंद्र का स्थान पाने के लिए धारा के रूप में दशापवित्र पर गिरो. (४)
O very intoxicating and revolutionary mon! You fall on Dashapavitra as stream to get the place of Indra worthy of worship. (4)