हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
प॒वित्रं॑ ते॒ वित॑तं ब्रह्मणस्पते प्र॒भुर्गात्रा॑णि॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑ । अत॑प्ततनू॒र्न तदा॒मो अ॑श्नुते श‍ृ॒तास॒ इद्वह॑न्त॒स्तत्समा॑शत ॥ (१)
हे मंत्रों के स्वामी सोम! तुम्हारा पवित्र अंश सब जगह विस्तृत है. तुम प्रभु बनकर पीने वाले के अंगों में फैल जाते हो. तुम्हारे पवित्र अंश को तपस्यारहित एवं अपरिपक्व व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता. परिपक्व एवं यज्ञ करने वाले लोग ही तुम्हारे पवित्र अंश को प्राप्त करते हैं. (१)
O Lord of mantras Mon! Your holy passage is detailed all over the place. You become lord and spread out in the organs of the drinker. Your holy part cannot be attained by a person without penance and immature. It is the mature and the people who perform the yajna that receive your holy part. (1)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
तपो॑ष्प॒वित्रं॒ वित॑तं दि॒वस्प॒दे शोच॑न्तो अस्य॒ तन्त॑वो॒ व्य॑स्थिरन् । अव॑न्त्यस्य पवी॒तार॑मा॒शवो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑ तिष्ठन्ति॒ चेत॑सा ॥ (२)
शत्रुओं को कष्ट देने वाले सोम का पवित्र अंश द्युलोक के ऊंचे स्थान पर विस्तृत है। उसकी तेजस्वी किरणें विविध प्रकार से स्थित होती हैं. सोम का शीघ्रगामी रस यजमान की रक्षा करता है. इसके बाद वह देवों के समीप जाने वाली बुद्धि से स्वर्ग के ऊंचे स्थान में मिलता है. (२)
The sacred part of The Som, who has tormented the enemies, extends to the high place of Duloka. Its bright rays are located in various ways. The early juice of Som protects the host. After this, he is found in the high place of heaven by the wisdom that goes near to the gods. (2)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
अरू॑रुचदु॒षसः॒ पृश्नि॑रग्रि॒य उ॒क्षा बि॑भर्ति॒ भुव॑नानि वाज॒युः । मा॒या॒विनो॑ ममिरे अस्य मा॒यया॑ नृ॒चक्ष॑सः पि॒तरो॒ गर्भ॒मा द॑धुः ॥ (३)
सूर्य से संबंधित एवं प्रमुख सोम दीप्तिशाली बनते हैं. जल बरसाने वाले सोम अन्न की इच्छा करते हुए प्राणियों को पुष्ट करते हैं. इन बुद्धिमान्‌ सोम की बुद्धि द्वारा मनुष्यों को देखने वाले देव संसार को बनाते हैं एवं पालक देव ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं. (३)
Related to the Sun and the chief som becomes radiant. The som who showers water reinforces the beings by wanting food. Through the wisdom of these wise somas, the gods who see human beings make up the world and the guardian god conceives in the medicines. (3)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
ग॒न्ध॒र्व इ॒त्था प॒दम॑स्य रक्षति॒ पाति॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः । गृ॒भ्णाति॑ रि॒पुं नि॒धया॑ नि॒धाप॑तिः सु॒कृत्त॑मा॒ मधु॑नो भ॒क्षमा॑शत ॥ (४)
जल के धारणकर्तता आदित्य सोम के स्थान की रक्षा करते हैं. अदभुत सोम देवों के जन्मों की रक्षा करते हैं एवं पाशों के स्वामी बनकर हमारे शत्रु को पाशों में जकड़ते हैं. अतिशय पुण्यशाली लोग मधुर सोम का रस पान करते हैं. (४)
The holding of water protects the place of Aditya Som. The wonderful soma protects the births of the gods and becomes the masters of the loops and binds our enemy in the loops. The most virtuous people drink the juice of Madhur Som. (4)

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
ह॒विर्ह॑विष्मो॒ महि॒ सद्म॒ दैव्यं॒ नभो॒ वसा॑नः॒ परि॑ यास्यध्व॒रम् । राजा॑ प॒वित्र॑रथो॒ वाज॒मारु॑हः स॒हस्र॑भृष्टिर्जयसि॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥ (५)
हे जलयुक्त सोम! तुम जल को आच्छादित करते हुए विशाल यज्ञशाला में जाते हो. हे पवित्र रथ वाले राजा सोम! तुम युद्ध में जाते हो. हे अपरिमित गमन वाले सोम! तुम हमारे लिए बहुत सा अन्न जीतते हो. (५)
O jalyukta mon! You go to the huge yajnashala covering the water. O king of the holy chariot, Mon! You're going to war. O Mon of infinite passage! You win a lot of food for us. (5)