हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.86.33

मंडल 9 → सूक्त 86 → श्लोक 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 86
राजा॒ सिन्धू॑नां पवते॒ पति॑र्दि॒व ऋ॒तस्य॑ याति प॒थिभिः॒ कनि॑क्रदत् । स॒हस्र॑धारः॒ परि॑ षिच्यते॒ हरिः॑ पुना॒नो वाचं॑ ज॒नय॒न्नुपा॑वसुः ॥ (३३)
नदियों के ईश्वर एवं स्वर्ग के स्वामी सोम शुद्ध किए जाते हैं एवं शब्द करते हुए यज्ञ के मार्ग से जाते हैं. असीम धाराओं वाले सोम ऋत्विजों द्वारा पात्रों में भरे जाते हैं. सोम हरे रंग वाले, शब्द करते हुए, शुद्ध होने वाले एवं समीप जाने वाले हैं. (३३)
Som, the God of the rivers and the lord of heaven, are purified and go through the path of yajna by saying words. Soms with infinite streams are filled into characters by the ritwijas. Mon is green, speaking words, purging and approaching. (33)