हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.97.33

मंडल 9 → सूक्त 97 → श्लोक 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 97
दि॒व्यः सु॑प॒र्णोऽव॑ चक्षि सोम॒ पिन्व॒न्धाराः॒ कर्म॑णा दे॒ववी॑तौ । एन्दो॑ विश क॒लशं॑ सोम॒धानं॒ क्रन्द॑न्निहि॒ सूर्य॒स्योप॑ र॒श्मिम् ॥ (३३)
हे दिव्य एवं शोभन पतन वाले सोम! तुम यज्ञ कर्म के द्वारा अपनी धाराएं गिराते हुए नीचे की ओर देखो एवं द्रोणकलश की ओर जाओ. तुम शब्द करते हुए सूर्य की कांति प्राप्त करो. (३३)
O divine and sobhan, the fallen mon! You look down at the bottom and go towards Dronakalash, dropping your currents through the yajna karma. You get the sun's brightness while doing the word. (33)