ऋग्वेद (मंडल 9)
मत्सि॑ वा॒युमि॒ष्टये॒ राध॑से च॒ मत्सि॑ मि॒त्रावरु॑णा पू॒यमा॑नः । मत्सि॒ शर्धो॒ मारु॑तं॒ मत्सि॑ दे॒वान्मत्सि॒ द्यावा॑पृथि॒वी दे॑व सोम ॥ (४२)
हे सोम! हमें अन्न और धन देने के लिए तुम वायु को प्रमुदित करो. तुम पवित्र होते हुए मित्रावरुण को प्रसन्न करो तथा मरुतों के बल एवं देवों को प्रमत्त करो. हे स्तुतियोग्य सोम! तुम द्यावा-पृथिवी को नशे में कर दो. (४२)
Hey Mon! To give us food and wealth, you muster the air. Be holy, please the friend and worship the gods and the strength of the maruts. O praiseworthy Mon! You make Dyava-Prithvi drunk. (42)