सामवेद (अध्याय 10)
यद्द्याव इन्द्र ते शतँशतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्त्सहस्रँ सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी ॥ (१)
हे इंद्र! सैकड़ों भूमि, सैकड़ों सूर्य और सैकड़ों लोक भी आप की महिमा के बराबर नहीं हो सकते. आप जैसा अब तक कोई उत्पन्न नहीं हुआ. भूमंडल और अंतरिक्षमंडल तक में आप की समानता कोई नहीं कर सकता. (१)
O Indra! Hundreds of lands, hundreds of suns and hundreds of worlds cannot even be equal to the glory of you. No one has arisen like you so far. No one can equate you even in the atmosphere and the space system. (1)
सामवेद (अध्याय 10)
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ अव मघवन्गोमति व्रजे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः ॥ (२)
हे इंद्र। आप बलवान, सामर्थ्यवान व मनोकामनाएं पूरी करने वाले हैं. आप धनवान, वज्रधारी व श्रेष्ठ मतिवान हैं. आप अपने रक्षा साधनों के साथ पधारिए. आप गायों से भरे हुए बाड़े प्रदान कीजिए. (२)
O Indra. You are strong, powerful and fulfilling wishes. You are rich, vajradhari and superior. You come with your defense tools. You provide enclosures full of cows. (2)
सामवेद (अध्याय 10)
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः । पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते ॥ (३)
हे इंद्र! आप शत्रुनाशी हैं. हम सोमरस को जलप्रवाह की भांति आप के पास प्रवाहित कर के लाते हैं. हम आप को परिष्कृत सोमरस चढ़ाते तथा विराजने के लिए आप को कुश का आसन भेंट करते हैं. (३)
O Indra! You are an enemy. We bring somers to you like a water flow. We offer you a refined somerasa and offer you the seat of Kush to sit. (3)
सामवेद (अध्याय 10)
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः । कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वँसगः ॥ (४)
हे इंद्र! आप सर्वत्र वास करते हैं. आप सब को वास देते हैं. यजमान सोमरस चढ़ा कर आप की उपासना करते हैं. आप बैलों की तरह आवाज करते हुए अपने बेटों के यहां कब पधारने की कृपा करेंगे? (४)
O Indra! You live everywhere. You give everyone a residence. The host worships you by offering somras. When would you be pleased to come to your sons' place, sounding like bulls? (4)
सामवेद (अध्याय 10)
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम् । पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे ॥ (५)
हे इंद्र! आप धनी, ज्ञानी, शत्रुनाशी व बहुरंगी हैं. आप हजारों तरह के वैभव व हजारों गुनी शक्ति दे सकते हैं. हम कण्ववंशी यजमान आप की उपासना करते हैं. (५)
O Indra! You are rich, knowledgeable, hostile and multi-colored. You can give thousands of types of splendour and thousands of times the power. We Kanvavanshi hosts worship you. (5)
सामवेद (अध्याय 10)
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा । आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रुवम् ॥ (६)
हे इंद्र! हम आप के उपासक हैं. हम भव सागर पार करना चाहते हैं. हम बुद्धि का बल (शारीरिक बल के साथसाथ) भी पाना चाहते हैं. चलता हुआ पहिया जैसे एकदम नीचे आ जाता है, वैसे ही हम प्रार्थना रूपी पहिए से इंद्र के लिए झुक जाते हैं. (६)
O Indra! We are worshippers of you. We want to cross bhav sagar. We also want to get the strength of intelligence (along with physical strength). As the moving wheel comes down, we bow down to Indra with the wheel of prayer. (6)
सामवेद (अध्याय 10)
न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते न स्रेधन्तँ रयिर्नशत् । सुशक्तिरिन्मघवं तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि ॥ (७)
हे इंद्र! सोमयाग में सशक्त (उत्तम) उपासकों को आप उचित (उपयुक्त) धन प्रदान करते हैं. जो लोग दानदाता की निंदा करते हैं, जो लोग अच्छा काम करने वालों की निंदा करते हैं, ऐसे लोगों पर आप अपनी कृपा मत कीजिए. (७)
O Indra! You provide proper (suitable) money to the strong (best) worshippers in Somayag. Those who condemn donors, those who condemn those who do good work, don't be kind to such people. (7)