सामवेद (अध्याय 11)
पवमान धिया हितो३ऽभि योनिं कनिक्रदत् । धर्मणा वायुमारुहः ॥ (३)
हे सोम! बुद्धिपूर्वक आप की प्रतिष्ठा की जाती है. आप हितकारी हैं और आवाज करते हुए द्रोणकलश में प्रवेश करते हैं. आप वायु के साथ कलश में स्थापित होइए. (३)
O Mon! You are intellectually distinguished. You are benevolent and enter Dronakalsh by making a sound. You install in the urn with air. (3)