हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे । मरुद्भ्यो वायवे मदः ॥ (१)
हे सोम! आप दक्ष, साधन संपन्न, उल्लास बढ़ाने वाले व बलवर्द्धक हैं. आप देवताओं के पीने के लिए बढ़ोतरी पाते हैं. आप मरुद्गणों के लिए प्रवाहित होइए. आप वायु के लिए प्रवाहित होइए. (१)
O Mon! You are skilled, resourceful, cheerful and strong. You find hikes to the drinking of the gods. You flow to the deserts. You flow for air. (1)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
सं देवैः शोभते वृषा कविर्योनावधि प्रियः । पवमानो अदाभ्यः ॥ (२)
हे सोम! आप कवि, प्रिय, बलवान व देवताओं के बीच शोभायमान होते हैं. आप परिष्कृत हो कर प्रवाहित होइए. (२)
O Mon! You are a poet, beloved, strong and beautiful among the gods. You get refined and flow. (2)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
पवमान धिया हितो३ऽभि योनिं कनिक्रदत् । धर्मणा वायुमारुहः ॥ (३)
हे सोम! बुद्धिपूर्वक आप की प्रतिष्ठा की जाती है. आप हितकारी हैं और आवाज करते हुए द्रोणकलश में प्रवेश करते हैं. आप वायु के साथ कलश में स्थापित होइए. (३)
O Mon! You are intellectually distinguished. You are benevolent and enter Dronakalsh by making a sound. You install in the urn with air. (3)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
तवाहँ सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे । पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीँ रति ताँइहि ॥ (४)
हे सोम! आप प्रकाशमान हैं. हम प्रतिदिन आप से मित्रता करने के लिए इच्छुक रहते हैं. आप उन सभी का नाश कीजिए, जो हमें सताते हैं. (४)
O Mon! You are shining. We are willing to befriend you every day. You destroy all those who persecute us. (4)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
तवाहं नक्तमुत सोम ते दिवा दुहानो बभ्र ऊधनि । घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पप्तिम ॥ (५)
हे सोम! आप चमकते हैं. आप उजले हैं. हमें दिनरात आप का साहचर्य प्राप्त हो. दूर से ही चमचमाते सूर्य की तरह आप को भी दूर से देखा जा सकता है. आप पक्षियों की भांति गतिशील हैं. (५)
O Mon! You shine. You're white. May we get your support day and night. Like the shining sun from a distance, you can also be seen from a distance. You are as dynamic as birds. (5)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः । शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः ॥ (६)
हे सोम! ब्राह्मण बुद्धिपूर्वक की गई प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप पवित्र, विलक्षण व सर्वद्रष्टा हैं. (६)
O Mon! Brahmins worship you with prayers made wisely. You are pure, unique and all-encompassing. (6)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
आ योनिमरुणो रुहद्गमदिन्द्रं वृषा सुतम् । ध्रुवे सदसि सीदतु ॥ (७)
सोमरस अरुण (गुलाबी) आभा वाला है. वह इंद्र के लिए द्रोणकलश में स्थापित किया जा रहा है. वह इंद्र को बलवान बनाता है. इंद्र उस सोमरस को पीने के लिए सदन में श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित हों. (७)
Someras Arun (pink) is aura. He is being set up in Dronakalash for Indra. He makes Indra strong. Indra should be distinguished in the best place in the House to drink that Someras. (7)

सामवेद (अध्याय 11)

सामवेद: | खंड: 4
नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यँ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणम् ॥ (८)
हे सोम! आप तृप्तिकारक हैं. आप हजार धाराओं से झरिए. आप सभी ओर से सब प्रकार का वैभव हमें प्रदान करने की कृपा कीजिए. (८)
O Mon! You are satiating. You jump from a thousand streams. Please give us all kinds of splendour from all sides. (8)