सामवेद (अध्याय 15)
तँ हि स्वराजं वृषभं तमोजसा धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामँ हि ते मनः ॥ (१०)
आकाश और पृथ्वी समर्थ व तेजोमय इंद्र को अपनी सामर्थ्य से प्रकट करते हैं. इंद्र अनुपम हैं. (सभी उपमानों में सर्वोत्तम हैं). हे इंद्र! आप सोम (पान की) की कामना से यज्ञवेदी पर अधिष्ठित होने की कृपा कीजिए. (१०)
The sky and the earth manifest the capable and radiant Indra with their power. Indra is unique. (Are the best of all byvalues). O Indra! Please be installed on the Yajnavedi with the wish of Soma (paan). (10)