हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 16.10.4

अध्याय 16 → खंड 10 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 16)

सामवेद: | खंड: 10
त्वँ हि राधस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विध्रत्ता । तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे ॥ (४)
हे इंद्र! आप धनपति, बहुत धनधारी एवं उपास्य हैं. हम यजमान शुद्ध और पवित्र सोमरस का आनंद लेने के लिए आप को आमंत्रित करते हैं. (४)
O Indra! You are rich, very rich and worshipable. We invite you to enjoy the host pure and holy Somers. (4)