हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 16.8.3

अध्याय 16 → खंड 8 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 16)

सामवेद: | खंड: 8
त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः । त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ (३)
हे अग्नि! वसिष्ठ ऋषि विशेष बुद्धिपूर्वक आप की स्तुति करते हैं. आप वरुण व मित्र स्वरूप हैं. आप के धन कल्याणकारी हों. आप अपनी मंगलकारी भावनाओं से हमारी रक्षा कीजिए. (३)
O agni! Vasishtha Rishi praises you with special intelligence. You are Varun and friendly. Your wealth should be welfare. Protect us from your auspicious feelings. (3)