हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 19.3.2

अध्याय 19 → खंड 3 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 19)

सामवेद: | खंड: 3
विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मं दिवो धरुणे सत्यमर्पितम् । अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा ॥ (२)
सूर्य बहुत प्रकाशमान व अन्न और बलदाता हैं. वे धर्म से स्वर्गलोक को धारण करते हैं, अमित्रो के नाशक हैं, वृत्रहंता हैं. वे शत्रुओं, राक्षसों व दुष्टों के नाशक हैं. वे सर्वत्र अपना प्रकाश फैलाते हैं. (२)
The sun is very bright and gives food and strength. They imbibe heaven by dharma, are the destroyers of Amitro, they are greater. They are the destroyers of enemies, demons and the wicked. They spread their light everywhere. (2)