सामवेद (अध्याय 24)
इन्द्र स्थातर्हरीणां न किष्टे पूर्व्यस्तुतिम् । उदानँश शवसा न भन्दना ॥ (२)
हे इंद्र! आप अश्वपति हैं. ऋषियों ने आप के लिए प्रार्थनाएं रची हैं. उन प्रार्थनाओं को (आप द्वारा दी गई) सामर्थ्य के अलावा और किसी तरह नहीं प्राप्त किया जा सकता है. (२)
O Indra! You are ashwapati. Sages have made prayers for you. Those prayers cannot be received in any way other than the power (given by you). (2)