सामवेद (अध्याय 25)
स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा । देवैरा सत्सि बर्हिषि ॥ (३)
हे अग्नि! आप अपनी चमकीली लपटों से अन्य देवताओं के साथ कुश के आसन पर विराजिए. आप हमारे मित्र हैं. (३)
O agni! You sit on the seat of Kush with other gods with your bright flames. You are our friend. (3)