हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 25.5.3

अध्याय 25 → खंड 5 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 25)

सामवेद: | खंड: 5
अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः । इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते ॥ (३)
जो यजमान अर्चना करते हैं, सोमरस को परिष्कृत करते हैं, अच्छे कार्य करते हैं, दान करते हैं, उन यजमानों को उषा अन्न व बल देती हैं और प्रकाशमान बना देती हैं. युद्ध में सञ्जित वीर की भांति वे आकाश की शोभा बढ़ा देती हैं. (३)
Those hosts who worship, refine someras, do good deeds, donate, Usha gives food and strength to those hosts and makes them bright. Like a warrior in battle, she adorns the sky. (3)