हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 26.3.4

अध्याय 26 → खंड 3 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 26)

सामवेद: | खंड: 3
प्र वो महे महेवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम् । विशः पूर्वीः प्र चर चर्षणिप्राः ॥ (४)
हे इंद्र! मनुष्य अपने धन की बढ़ोतरी के लिए आप को सोमरस समर्पित करते हैं. किंतु ऐसी श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. आप प्रजापालक हैं. आप हवि देने वाले यजमानों के पास पधारने की कृपा कीजिए. (४)
O Indra! Human beings dedicate somers to you for the increase of their wealth. But worship you with such excellent prayers. You are a prajapalak. Please come to the hosts who give you. (4)