हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 26.3.5

अध्याय 26 → खंड 3 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 26)

सामवेद: | खंड: 3
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः । तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः ॥ (५)
हे इंद्र! आप विशाल और महान हैं. यजमान आप की स्तुति व हवि अर्पित करते हैं. धीर पुरुष इंद्र के ब्रतों को डगमगाने नहीं देते हैं. (५)
O Indra! You are huge and great. The host praises and worships you. Patient men do not allow Indra's bratas to waver. (5)