सामवेद (अध्याय 26)
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः । तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः ॥ (५)
हे इंद्र! आप विशाल और महान हैं. यजमान आप की स्तुति व हवि अर्पित करते हैं. धीर पुरुष इंद्र के ब्रतों को डगमगाने नहीं देते हैं. (५)
O Indra! You are huge and great. The host praises and worships you. Patient men do not allow Indra's bratas to waver. (5)