सामवेद (अध्याय 27)
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्रा नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥ (१८)
जहां बाण इस तरह गिरते हैं, जैसे बिना चोटी वाले चंचल बालक गिर रहे हों, वहां अदिति और ब्रह्मणस्पति हमें सुख देने की कृपा करें. वे सदैव हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (१८)
Where arrows fall in such a way, as if playful children without braids are falling, Aditi and Brahmanaspati should be pleased to give us happiness. May they always be kind to benefit us. (18)