हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 4.5.3

अध्याय 4 → खंड 5 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 4)

सामवेद: | खंड: 5
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य । गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः ॥ (३)
हे इंद्र! आप सभी को प्रिय व शत्रुजित्‌ हैं. आप को कोई नहीं हरा सकता. आप गिरि जैसे विशाल व स्वर्गलोक के स्वामी हैं. आप विश्व के सभी वैभव हमें प्रदान कराने के लिए हमारे पास पृथ्वी पर पधारने की कृपा कीजिए. (३)
O Indra! You are loved and enemy to all. No one can beat you. You are as vast as Giri and the swami of heaven. Please come to earth with us to give us all the glory of the world. (3)