हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 7.5.13

अध्याय 7 → खंड 5 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 7)

सामवेद: | खंड: 5
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः । दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्या३ं नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः ॥ (१३)
सोम तो जैसे यज्ञ की जीभ ही हैं. सोमरस छनते समय आवाज करता है. यह मीठा और प्रिय रस वाला है. सोम यज्ञ संबंधी क्रियाकलापों को जानने वाले व निर्भय हैं. वे अपने मातापिता का नाम नहीं जानते. ये यजमान द्वारा तैयार किए जाते हैं. ये स्वर्गलोक को चमचमाने वाले हैं. ये छन कर तैयार हो जाने पर सोमजयी नामक तीसरे नाम को ग्रहण करते हैं. (१३)
Soma is like the tongue of the yajna. Somers makes a sound while filtering. It is sweet and sweet juice. Som is aware of yajna related activities and fearless. They don't know their parents' names. These are prepared by the host. They are the ones who shine heaven. When they are filtered and ready, they take the third name called Somjayi. (13)