यजुर्वेद (अध्याय 1)
प॒वित्रे॑ स्थो वैष्ण॒व्यौ सवि॒तुर्वः॑ प्रस॒व उत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य्य॑स्य रश्मिभिः॑। देवी॑रापोऽअग्रेगुवोऽअग्रेपु॒वोऽग्र॑ऽइ॒मम॒द्य य॒ज्ञं न॑य॒ताग्रे॑ य॒ज्ञप॑तिꣳ सु॒धातुं॑ य॒ज्ञप॑तिं देव॒युव॑म् ॥ (१२)
हे जल देव! इंदर ने वृत्र का नाश करने के लिए (सहयोग हेतु) आप को चुना. आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का वरण किया. आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का सहयोग किया. आप अग्नि के प्रिय हैं. हम अग्नि के लिए आप को परिष्कृत (शुद्ध) करते हैं. आप सोम के प्रिय हैं. हम सोम के लिए आप को परिष्कृत करते हैं. हम देवताओं से संबंधित कार्यो के लिए आप को शुद्ध करते हैं. (१२)
O God of Water! Inder chose you (for cooperation) to destroy the tree. You chose Indra in the destruction of Vritrasura. You helped Indra in the destruction of Vritrasura. You are the beloved of agni. We refine you for agni. You are dear to Mon. We refine you for Mon. We purify you for actions related to the gods. (12)