यजुर्वेद (अध्याय 1)
यु॒ष्माऽइन्द्रो॑ऽवृणीत वृत्र॒तूर्य्ये॑ यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृत्र॒तूर्ये॒ प्रोक्षि॑ता स्थ। अ॒ग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑म्य॒ग्नीषोमा॑भ्यां त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि। दैव्या॑य॒ कर्म॑णे शुन्धध्वं देवय॒ज्यायै॒ यद्वोऽशु॑द्धाः पराज॒घ्नुरि॒दं व॒स्तच्छु॑न्धामि ॥ (१३)
हे जल देव! हम देव संबंधी यज्ञ कार्यो के लिए आप को शुद्ध करते हैं. यज्ञ के अशुद्ध उपकरण भी ग्रहण करने योग्य नहीं होते. अशुद्ध जल भी यज्ञ में ग्रहण नहीं किया जाता. (१३)
O God of Water! We purify you for the yajna works related to God. The impure instruments of yajna are also not acceptable. Impure water is also not taken in the yajna. (13)