यजुर्वेद (अध्याय 13)
अ॒पां त्वेम॑न्त्सादयाम्य॒पां त्वोद्म॑न्सादयाम्य॒पां त्वा॒ भस्म॑न्त्सादयाम्य॒पां त्वा॒ ज्योति॑षि सादयाम्य॒पां त्वाय॑ने सादयाम्यर्ण॒वे त्वा॒ सद॑ने सादयामि समु॒द्रे त्वा॒ सद॑ने सादयामि। सरि॒रे त्वा॒ सद॑ने सादयाम्य॒पां त्वा॒ क्षये॑ सादयाम्य॒पां त्वा॒ सधि॑षि सादयाम्य॒पां त्वा॒ सद॑ने सादयाम्य॒पां त्वा॑ स॒धस्थे॑ सादयाम्य॒पां त्वा॒ योनौ॑ सादयाम्य॒पां त्वा॒ पुरी॑षे सादयाम्य॒पां त्वा॒ पाथ॑सि सादयामि। गाय॒त्रेण॑ त्वा॒ छन्द॑सा सादयामि॒ त्रैष्टु॑भेन त्वा॒ छन्द॑सा सादयामि॒ जाग॑तेन त्वा॒ छन्द॑सा सादया॒म्यानु॑ष्टुभेन त्वा॒ छन्द॑सा सादयामि॒ पाङ्क्ते॑न त्वा॒ छन्द॑सा सादयामि ॥ (५३)
हे (अपस्या नामक) इष्टके! जल को हम अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. जल को ओषधियों में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को भस्म में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को प्रकाश में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को उस के घर समुद्र मे प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को शरीर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को क्षय में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को आप के घर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को आप के मूल स्थान में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को नगर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को पथ में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को गायत्री छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को त्रैष्टुभ् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को जगती छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को अनुष्टुप् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को पंक्ति छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. (५३)
O (named Apasya) ishtake! We consider water in a different place. Water is distinguished in medicines. We associate water in bhasma. We establish water in light. We establish water in its home sea. We establish water in the body. We associate water in decay. We establish water in your home. We establish water in your native place. We establish water in the city. We establish water in the path. We associate water with Gayatri verses. We associate water with trishtubh verses. We associate water with jagati verses. We associate water with anushtup verse. We associate water with line verses. (53)