यजुर्वेद (अध्याय 14)
शु॒क्रश्च॒ शुचि॑श्च॒ ग्रैष्मा॑वृ॒तूऽ अ॒ग्नेर॑न्तःश्लेषोऽसि॒ कल्पे॑तां॒ द्यावा॑पृथि॒वी कल्प॑न्ता॒माप॒ऽ ओष॑धयः॒ कल्प॑न्ताम॒ग्नयः॒ पृथ॒ङ् मम॒ ज्यैष्ठ्या॑य॒ सव्र॑ताः। येऽअ॒ग्नयः॒ सम॑नसोऽन्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वीऽइ॒मे। ग्रैष्मा॑वृ॒तूऽ अ॑भि॒कल्प॑माना॒ऽइन्द्र॑मिव दे॒वाऽअ॑भि॒संवि॑शन्तु॒ तया॑ दे॒वत॑याङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वे सी॑दतम् ॥ (६)
हे इष्टकाओ! आप चमकीली, पवित्र, ग्रीष्म ऋतु जैसी और अग्नि के भीतर जुड़ी हुई हैं. आप स्वर्गलोक तक विस्तार पाएं. आप पृथ्वीलोक तक कल्पित होने की कृपा करें. जल और ओषधियां फल वाली हों. ब्रत सहित अग्नियां ज्येष्ठता (बड़प्पन) के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. जो अग्नियां हम समान मन वालों के भीतर हैं, वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को शोभित करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु को दोनों ओर से फलीभूत करती हुई इंद्र देव के समान देवताओं में शोभित हों. अपनी दिव्यता से अंगिरा की भांति स्थिरतापूर्वक विराजने की कृपा करें. (६)
O god! You are bright, holy, like summer and connected within agni. You can extend to heaven. Please imagine you to the land of earth. Water and medicines should be fruity. Please inspire the agnis including Brat to jyeshtha (nobility). May the agnis that are within us with the same mind be pleased to adorn heaven and earth. While bringing the summer season to fruition from both sides, be adorned in the gods like Indra Dev. Please sit still like an angira with your divinity. (6)