हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 17.98

अध्याय 17 → मंत्र 98 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
अ॒भ्यर्षत सुष्टु॒तिं गव्य॑मा॒जिम॒स्मासु॑ भ॒द्रा द्रवि॑णानि धत्त। इ॒मं य॒ज्ञं न॑यत दे॒वता॑ नो घृ॒तस्य॒ धारा॒ मधु॑मत्पवन्ते ॥ (९८)
हे देवताओ! यह यज्ञ घी से सिंचित है. श्रेष्ठ स्तुतियुक्त है. जिस यज्ञ में मधुर स्वाद वाली घी की कल्याणमयी धाराएं गिरती हैं, आप ऐसी घृतमयी मधुर आहुतियों को यज्ञ से देवलोक तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. (९८)
O gods! This yajna is irrigated with ghee. The best is praiseworthy. In the yajna in which the good streams of sweet tasted ghee fall, please take such sweet offerings from the yajna to Devlok. (98)