यजुर्वेद (अध्याय 20)
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोस्य॒श्विभ्यां॑ त्वा॒ सर॑स्वत्यै॒ त्वेन्द्रा॑य त्वा सु॒त्राम्ण॑ऽए॒ष ते॒ योनि॑र॒श्विभ्यां॑ त्वा॒ सर॑स्वत्यै॒ त्वेन्द्रा॑य त्वा सु॒त्राम्णे॑ ॥ (३३)
हे ओषधि रूप रस! आप को दोनों अश््विनीकुमारों के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप को सरस्वती के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. आप को इंद्र के उत्तम संरक्षण हेतु ग्रहण किया गया है. यह अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी और इंद्र देव का मूल स्थान है. अश्विनीकुमार, सरस्वती देवी और इंद्र देव की कृपा से हमारा संरक्षण हो. (३३)
O medicinal form juice! You have been eclipsed in upyam for both Ashwinikumars. You have been accepted for the best protection of Saraswati. You have been assumed for the best protection of Indra. It is the original place of Ashwinikumar, Saraswati Devi and Indra Dev. May we be protected by the grace of Ashwinikumar, Saraswati Devi and Indra Dev. (33)