हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 33.44

अध्याय 33 → मंत्र 44 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
प्र वा॑वृजे सुप्र॒या ब॒र्हिरे॑षा॒मा वि॒श्पती॑व॒ बीरि॑टऽइयाते।वि॒शाम॒क्तोरु॒षसः॑ पू॒र्वहू॑तौ वा॒युः पू॒षा स्व॒स्तये॑ नि॒युत्वा॑न् ॥ (४४)
यजमान अपने कल्याण के लिए उषाकाल में वायु व पूषा देव को आमंत्रित करते हैं. यजमान इन देवों के लिए कुश के आसन भेंट करते हैं. ये देव ठाटबाट से राजा की तरह पधारते हैं. (४४)
The host invites Vayu and Pusha Dev in Ushakal for their welfare. The hosts offer kush asanas to these gods. These gods come like a king from Thatbat. (44)