यजुर्वेद (अध्याय 4)
अ॒भि त्यं दे॒वꣳ स॑वि॒तार॑मो॒ण्योः क॒विक्र॑तु॒मर्चा॑मि स॒त्यस॑वꣳ रत्न॒धाम॒भि प्रि॒यं म॒तिं क॒विम्। ऊ॒र्ध्वा यस्या॒मति॒र्भाऽअदि॑द्यु॒त॒त् सवी॑मनि॒ हिर॑ण्यपाणिरमिमीत सु॒क्रतुः॑ कृ॒पा स्वः॑। प्र॒जाभ्य॑स्त्वा प्र॒जास्त्वा॑ऽनु॒प्राण॑न्तु प्र॒जास्त्वम॑नु॒प्राणि॑हि ॥ (२५)
हे सविता देव! आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच में विराजमान हैं. आप विद्वान, सत्यवान व रलों के धाम हैं. आप विद्वानों द्वारा चाहे गए हैं. आप ऊंचाई की ओर जाने वाले, चमकदार, सुनहरे हाथों व श्रेष्ठ कार्यो वाले हैं. आप हम पर अपनी कृपा बनाए रखें. हम आप की अर्चना करते हैं. हम प्रजा के लिए आप की उपासना करते हैं. प्रजा सांस लेने में आप का अनुसरण करती है. आप भी प्रजा का अनुसरण करते हुए सांस लेने की कृपा करें. (२५)
O Savita Dev! You are seated between heaven and earth. You are a scholar, satyavan and the abode of the rals. You have been wanted by scholars. You are going towards height, shiny, golden hands and superior work. May you keep your grace on us. We worship you. We worship you for the sake of the people. The subjects follow you in breathing. Please also follow the subjects and breathe. (25)