यजुर्वेद (अध्याय 7)
यस्ते॑ द्र॒प्स स्कन्द॑ति॒ यस्ते॑ऽअ॒ꣳशुर्ग्राव॑च्युतो धि॒षण॑योरु॒पस्था॑त्। अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ परि॑ वा॒ यः प॒वित्रा॒त्तं ते॑ जुहोमि॒ मन॑सा॒ वष॑ट्कृत॒ꣳ स्वाहा॑ दे॒वाना॑मुत्क्रम॑णमसि ॥ (२६)
हे सोम! आप का जो अंश पत्थरों से टूटते समय, निचोड़ते और छानते समय इधरउधर गिर जाता है, जो यज्ञ में आहुति डालने के बाद अध्वर्यु के पास बच जाता है, हम उस पवित्र भाग को मन से इकट्ठा करते हैं. एकत्रित किए हुए इस अंश को अग्नि को समर्पित करते हैं. सोम को संकल्पपूर्वक स्वाहा. आप देवताओं को ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाले हैं. (२६)
O Mon! The part of you that falls here and there while breaking with stones, squeezing and filtering, which is left near Adhwaryu after sacrificing in the yajna, we collect that holy part from the mind. This collected part is dedicated to agni. On Monday, he was determined. You are going to give upwards to the gods. (26)