यजुर्वेद (अध्याय 7)
इन्द्र॑ मरुत्वऽइ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒ यथा॑ शार्या॒तेऽअपि॑बः सु॒तस्य॑। तव॒ प्रणी॑ती॒ तव॑ शूर॒ शर्म॒न्नावि॑वासन्ति क॒वयः॑ सुय॒ज्ञाः। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा म॒रुत्व॑तऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा म॒रुत्व॑ते ॥ (३५)
हे इंद्र देव! हे मरुद् देव! आप सोम की रक्षा कीजिए. जैसे आप ने शर्याति के यज्ञ में सोमरस पीने की कृपा की, वैसे ही आप इस यज्ञ में पधारिए और सोमरस पीने की कृपा कीजिए. आप शूरवीर, सुखदाता, श्रेष्ठ यज्ञ वाले एवं अच्छे कबि है. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मरुद्गण देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. बही आप का मूल स्थान है. आप मरुद्गण के साथ यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. (३५)
O Lord Indra! O God! You protect Som. Just as you were pleased to drink somras in the yagna of sharyati, so you should come to this yajna and drink somras. You are brave, pleasant, have the best sacrifice and are good kabirs. You have been received in the kalash for Indra Dev. You have been accepted in the upayam for Marudgan Dev. The book is your native place. Please be stable here with the desert. (35)