हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 7.45

अध्याय 7 → मंत्र 45 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
रू॒पेण॑ वो रू॒पम॒भ्यागां॑ तु॒थो वो वि॒श्ववे॑दा॒ विभ॑जतु। ऋ॒तस्य॑ प॒था प्रेत॑ च॒न्द्रद॑क्षिणा॒ वि स्वः॒ पश्य॒ व्यन्तरि॑क्षं॒ यत॑स्व सद॒स्यैः ॥ (४५)
हम अपने रूप से आप के रूप की ओर गमन करना चाहते हैं. देवगण सर्वज्ञ हैं. वे देवगण सभी के लिए सुख बांटने की कृपा करें. उन की कृपा से हम सत्य के पथ के पथिक बनें. जैसे चंद्र देव अंतरिक्ष से देखते हैं, वैसे ही हम भी दूर दृष्टिवान हों. (४५)
We want to move from your form to your form. Devgan is omniscient. May those gods bless everyone to share happiness. By his grace, let us be on the path of truth. Just as Chandra Dev sees from space, so we should also be far-sighted. (45)