हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 8.50

अध्याय 8 → मंत्र 50 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
उ॒शिक् त्वं दे॑व सोमा॒ग्नेः प्रि॒यं पाथोऽपी॑हि व॒शी त्वं दे॑व सो॒मेन्द्र॑स्य प्रि॒यं पाथोऽपी॑ह्य॒स्मत्स॑खा॒ त्वं दे॑व सोम॒ विश्वे॑षां दे॒वानां॑ प्रि॒यं पाथोऽपी॑हि ॥ (५०)
हे सोम! आप अग्नि का (मन भाता) आहार बनिए. आप पथ के भोजन के रूप में प्राप्त होइए. आप बंशवर्ती व सोम के प्रिय हैं. हे सोम! आप हमारे मित्र, आप सभी को प्रिय व सब के लिए तृप्तिदायी हैं. (५०)
O Mon! You become the food of agni. You get it as the food of the path. You are dear to Banshavarti and Som. O Mon! You are our friend, dear to all of you and satisfying to all. (50)