यजुर्वेद (अध्याय 9)
ग्रहा॑ऽऊर्जाहुतयो॒ व्यन्तो॒ विप्रा॑य म॒तिम्। तेषां॒ विशि॑प्रियाणां वो॒ऽहमिष॒मूर्ज॒ꣳ सम॑ग्रभमुपया॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा॒ जुष्टं॑ गृह्णाम्ये॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा॒ जुष्ट॑तमम्। स॒म्पृचौ॑ स्थः॒ सं मा॑ भ॒द्रेण॑ पृङ्क्तं वि॒पृचौ॑ स्थो॒ वि मा॑ पा॒प्मना॑ पृङ्क्तम् ॥ (४)
हे सोम और सोमरस के पात्रो! हम ऊर्जा पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप ब्राह्मणों की बुद्दि विस्तृत करते हैं. आप यजमानों के लिए ऊर्जस्वी रस को भलीभांति स्थापित करते हैं. हम आप दोनों को इंद्र देव के लिए उपयाम पात्र में स्थापित करते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. आप दोनों इंद्र देव के अभीष्ट हैं. आप दोनों संपृक्त (साथसाथ) रह कर हमारा कल्याण व हमें सुख प्रदान कीजिए. आप दोनों पृथक् (अलग) रह कर हमें पापों से दूर करने की कृपा कीजिए. (४)
O characters of Mon and Someras! We call upon you to get energy. You expand the intellect of Brahmins. You establish the energetic juice well for the hosts. We establish both of you in the upyam character for Indra Dev. You are the vagina of Indra Dev. Both of you are the desired of Indra Dev. May both of you be united and give us welfare and happiness. Please both of you to stay separate and remove us from sins. (4)