हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.19.3

कांड 1 → सूक्त 19 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 19
यो नः॒ स्वो यो अर॑णः सजा॒त उ॒त निष्ट्यो॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति । रु॒द्रः श॑र॒व्य॑यै॒तान्ममा॒मित्रा॒न्वि वि॑ध्यतु ॥ (३)
हमारी जाति का अधिक बली, शत्रु समान शक्ति वाला अथवा निकृष्ट बलशाली जो मनुष्य हमें दास बनाना चाहता है, हमारे उन अमित्रों को, सब को रुलाने वाले संहार कर्ता देव रुद्र अपने बाणों से बींध डालें. (३)
The more powerful, enemy-like power or the worst powerful man of our jati who wants to make us slaves, those unfriendly, the destroyer God Rudra, who makes everyone cry, should pierce with his arrows. (3)