अथर्ववेद (कांड 1)
यः स॒पत्नो॒ यो ऽस॑पत्नो॒ यश्च॑ द्वि॒षन्छपा॑ति नः । दे॒वास्तं सर्वे॑ धूर्वन्तु॒ ब्रह्म॒ वर्म॒ ममान्त॑रम् ॥ (४)
जो हमारी जाति का अथवा भिन्न जाति का पुरुष हम से द्वेष रखने के कारण हमें शाप देता है, इंद्र आदि सभी देव उस का विनाश करें. मेरे द्वारा प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें. (४)
Whoever curses us for hating us, all gods like Indra etc. should destroy him. The mantras I use protect me from his curse. (4)