अथर्ववेद (कांड 10)
त्रि॒षु पात्रे॑षु॒ तं सोम॒मा दे॒व्यहरद्व॒शा । अथ॑र्वा॒ यत्र॑ दीक्षि॒तो ब॒र्हिष्यास्त॑ हिर॒ण्यये॑ ॥ (१२)
जहां दीक्षा धारण करने वाला अथर्ववेदी यजमान स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठा था, वहां दिव्य गुणों वाली वशा गी ने तीन पात्रों में सोमरस को भर दिया. (१२)
Where the Atharvavedi host, who took initiation, was sitting on the seat of golden Kushas, Vasha Gi with divine qualities filled Someras in three characters. (12)