हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.10.17

कांड 10 → सूक्त 10 → मंत्र 17 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
तद्भ॒द्राः सम॑गच्छन्त व॒शा देष्ट्र्यथो॑ स्व॒धा । अथ॑र्वा॒ यत्र॑ दीक्षि॒तो ब॒र्हिष्यास्त॑ हिर॒ण्यये॑ ॥ (१७)
यज्ञ में दीक्षित अथर्ववेद के मंत्रों का ज्ञाता ब्राह्मण जहां स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठता है, वहां भद्र पुरुष अथवा कल्याणकारी तत्त्व एकत्र होते हैं, वहां वशा गौ अन्न देने वाली एवं यज्ञ के साधन के रूप में उपस्थित होती है. (१७)
In the yajna, where the Brahmin, who knows the mantras of Dixit Atharvaveda, sits on the seat of golden Kushas, bhadra purush or welfare elements gather, there the vasha cow is present as a food provider and a means of yajna. (17)