हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.2.10

कांड 10 → सूक्त 2 → मंत्र 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
आर्ति॒रव॑र्ति॒र्निरृ॑तिः॒ कुतो॒ नु पुरु॒षेऽम॑तिः । राद्धिः॒ समृ॑द्धि॒रव्यृ॑द्धिर्म॒तिरुदि॑तयः॒ कुतः॑ ॥ (१०)
पुरुष में पाप, आजीविका विरोधी तत्त्व, दुष्कर्म आदि कहां से प्राप्त होते हैं? इसे ऋद्धि, सिद्धि, समृद्धि, बुद्धि एवं उन्नति कहां से प्राप्त होती है. (१०)
Where do sins, anti-livelihood elements, misdeeds, etc. come from in a man? Where does it get riddhi, siddhi, prosperity, intelligence and progress? (10)