हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.7.18

कांड 10 → सूक्त 7 → मंत्र 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
यस्य॒ शिरो॑ वैश्वान॒रश्चक्षु॒रङ्गि॑र॒सोऽभ॑वन् । अङ्गा॑नि॒ यस्य॑ या॒तवः॑ स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्वि॑दे॒व सः ॥ (१८)
जिस का शीश वैश्वानर अग्नि और नेत्र अंगिरस हुए, जिस के अंग ही राक्षस बने, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१८)
Tell me about the God whose head is The Vaishvanar Agni and the Eyes Are Angiras, whose organs become demons, whose eyes are Who is He? (18)