अथर्ववेद (कांड 10)
यस्य॒ त्रय॑स्त्रिंशद्दे॒वा नि॒धिं रक्ष॑न्ति सर्व॒दा । नि॒धिं तम॒द्य को वे॑द॒ यं दे॑वा अभि॒रक्ष॑थ ॥ (२३)
तैंतीस देवता सदा जिस की निधि अर्थात् खजाने की रक्षा करते हैं, हे देवो! जिस की निधि की तुम रक्षा करते हो, आज उसे कौन जानता है? (२३)
Thirty-three gods always protect the treasure, O Devo! Who knows the treasure you protect today? (23)