अथर्ववेद (कांड 10)
इ॒यं क॑ल्या॒ण्यजरा॒ मर्त्य॑स्या॒मृता॑ गृ॒हे । यस्मै॑ कृ॒ता शये॒ स यश्च॒कार॑ ज॒जार॒ सः ॥ (२६)
यह कल्याणी आत्मा वृद्धावस्था से रहित है तथा मरणशील शरीर रूपी घर में रह कर भी अमर है. जिस आत्मा के लिए शरीर का निर्माण हुआ है, वह इस में शयन करती है. वह शरीर ही वृद्ध होता है. (२६)
This Kalyani soul is devoid of old age and is immortal even after living in a dying body. The soul for which the body is built sleeps in it. That body is old. (26)