हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.8.33

कांड 10 → सूक्त 8 → मंत्र 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
अ॑पू॒र्वेणे॑षि॒ता वाच॒स्ता व॑दन्ति यथाय॒थम् । वद॑न्ती॒र्यत्र॒ गच्छ॑न्ति॒ तदा॑हु॒र्ब्राह्म॑णं म॒हत् ॥ (३३)
वह परमात्मा अपूर्व है अर्थात्‌ उस से पहले कोई नहीं था. उस ने ही इन वाणियों को प्रेरित किया है जो वास्तविकता का वर्णन करती हैं. वर्णन करती हुई वाणियां जहां पहुंचती हैं, उसी को महान ब्राह्मण अर्थात वेद मंत्रों का समूह कहा गया है. (३३)
That God is unique, that is, there was no one before him. It is he who has inspired these narratives that describe reality. Where the narrating verses reach, it has been called the great Brahmin i.e. the group of Veda mantras. (33)