अथर्ववेद (कांड 10)
यौ त॑ उ॒रू अ॑ष्ठी॒वन्तौ॒ ये श्रोणी॒ या च॑ ते भ॒सत् । आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ (२१)
हे शतौदना गी! तेरे पैर, तेरे घुटने, तेरे कूल्हे और प्रजनन अंग सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२१)
O shatabana gi! May your feet, your knees, your hips and reproductive organs always give curd, sweet milk and ghee to your donor. (21)