अथर्ववेद (कांड 10)
यत्ते॒ चर्म॑ शतौदने॒ यानि॒ लोमा॑न्यघ्न्ये । आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ (२४)
हे शतौदना गौ! तेरा जो चमड़ा है, हे हिंसा के अयोग्य! तेरे जो बाल हैं, वे सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२४)
O Shataudana Gau! Your leather is unworthy of violence! May your hair always give curd, sweet milk and ghee to your donor. (24)