हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.1.25

कांड 11 → सूक्त 1 → मंत्र 25 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
शृ॒तं त्वा॑ ह॒व्यमुप॑ सीदन्तु दै॒वा निः॒सृप्या॒ग्नेः पुन॑रेना॒न्प्र सी॑द । सोमे॑न पू॒तो ज॒ठरे॑ सीद ब्र॒ह्मणा॑मार्षे॒यास्ते॒ मा रि॑षन्प्राशि॒तारः॑ ॥ (२५)
हे पके हुए एवं हवन के योग्य भात! देव तुम्हारे समीप बैठे. तुम अग्नि के समीप से निकल कर इन्हें प्रसन्न करो. दूध, दही, रूप, अमृत से पवित्र तुम ब्राह्मणों के पेट में बैठो. अपनेअपने गोत्र और प्रवर को जानने वाले ये ब्राह्मण तुम्हें खा कर नष्ट न हों अर्थात्‌ तुम इन की हिंसा मत करना. (२५)
O cooked and worthy of havana! God sat near you. You come out of the agni and please them. You sit in the stomach of Brahmins, pure with milk, yogurt, form, nectar. These Brahmins, who know their own tribe and pravara, should not eat you and destroy you, that is, you should not commit violence against them. (25)