हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.1.29

कांड 11 → सूक्त 1 → मंत्र 29 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
अ॒ग्नौ तुषा॒ना व॑प जा॒तवे॑दसि प॒रः क॒म्बूकाँ॒ अप॑ मृड्ढि दू॒रम् । ए॒तं शु॑श्रुम गृहरा॒जस्य॑ भा॒गमथो॑ विद्म॒ निरृ॑तेर्भाग॒धेय॑म् ॥ (२९)
हे ऋत्विज्‌! ब्रह्मौदन से अलग की गई भूसी को जातवेद अग्नि में डालो तथा कंबूकों अर्थात्‌ फलकणों को पैर से दूर मसल दो. इस कंबूक को मैं ने गृहपति अर्थात्‌ वास्तु देवता का भाग सुना है. इसे मैं पाप देवता निर्त्ऋति का भाग जानता हूं. (२९)
O Ritvij! Put the husk separated from the Brahmaudan in the Jatveda agni and mash the kambukas i.e. the phalkans away from the feet. I have heard this kambuk as a part of grihapati i.e. vastu devta. I know it to be part of the sin god Nirtriti. (29)