हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.1.30

कांड 11 → सूक्त 1 → मंत्र 30 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
श्राम्य॑तः॒ पच॑तो विद्धि सुन्व॒तः पन्थां॑ स्व॒र्गमधि॑ रोहयैनम् । येन॒ रोहा॒त्पर॑मा॒पद्य॒ यद्वय॑ उत्त॒मं नाकं॑ पर॒मं व्योम ॥ (३०)
हे ब्रह्मौदन! इन दीक्षा रूप तप करने वालों को, ब्रह्मौदन पकाने वालों को एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों को जानो तथा स्वर्ग के मार्ग पर स्थापित करो. उस मार्ग से चल कर यजमान उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में स्थित हो. उत्तम पक्षी बाज के समान ये जिस प्रकार सवर्ग में पहुंच सके, वैसा करो. (३०)
O Brahmaudan! Know the meditators, those who cook brahmaudans and the hosts who squeeze somras and set them on the path to heaven. By walking through that path, the host is located in a good and sorrow-free heaven. Do as best birds as they can reach the class. (30)