अथर्ववेद (कांड 11)
प्रा॒णाय॒ नमो॒ यस्य॒ सर्व॑मि॒दं वशे॑ । यो भू॒तः सर्व॑स्येश्व॒रो यस्मि॒न्त्सर्वं॒ प्रति॑ष्ठितम् ॥ (१)
इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत् है. यह प्राण सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत् स्थित है. (१)
Salutations to this soul, under whose control this whole grazing world is. This soul is the God of all and in it the whole world is located. (1)
अथर्ववेद (कांड 11)
नम॑स्ते प्राण॒ क्रन्दा॑य॒ नम॑स्ते स्तनयि॒त्नवे॑ । नम॑स्ते प्राण वि॒द्युते॒ नम॑स्ते प्राण॒ वर्ष॑ते ॥ (२)
हे ध्वनि करते हुए प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार है, मेघ घटा में घुस कर वर्षा करने वाले तुम्हारे लिए नमस्कार है. बिजली के रूप में प्रकाशित एवं वर्षा करते हुए तुम्हें नमस्कार है. (२)
O soul making sound! Salutations to you, salutations to you who enter the cloud and rain. Salutations to you while lighting and raining in the form of electricity. (2)
अथर्ववेद (कांड 11)
यत्प्रा॒ण स्त॑नयि॒त्नुना॑भि॒क्रन्द॒त्योष॑धीः । प्र वी॑यन्ते॒ गर्भा॑न्दध॒तेऽथो॑ ब॒ह्वीर्वि जा॑यन्ते ॥ (३)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से उत्पन्न होती हैं. (३)
When prana i.e. suryakya dev thunders by targeting barley, wheat, and wild trees through cloud sound in the rainy season, then all crops conceive and are produced in many ways. (3)
अथर्ववेद (कांड 11)
यत्प्रा॒ण ऋ॒तावाग॑तेऽभि॒क्रन्द॒त्योष॑धीः । सर्वं॑ त॒दा प्र मो॑दते॒ यत्किं च॒ भूम्या॒मधि॑ ॥ (४)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा ऋतु आने पर फसलों को लक्ष्य कर के गर्जन करते हैं, तब भूमि पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब प्रसन्न होते हैं. (४)
When prana i.e. suryak dev roars by targeting the crops when the rainy season comes, then all the creatures on the ground are happy. (4)
अथर्ववेद (कांड 11)
य॒दा प्रा॒णो अ॒भ्यव॑र्षीद्व॒र्षेण॑ पृथि॒वीं म॒हीम् । प॒शव॒स्तत्प्र मो॑दन्ते॒ महो॒ वै नो॑ भविष्यति ॥ (५)
जिस समय प्राण अर्थात् सूर्य देव, पृथ्वी को वर्षा के जल से सभी ओर गीला कर देते हैं, उस समय गाय आदि पशु प्रसन्न होते हैं कि घास की अधिकता से हमारे लिए उत्सव होगा. (५)
At the time when prana i.e. Sun God wets the earth on all sides with rainwater, at that time cows etc. animals are happy that there will be celebration for us with the excess of grass. (5)
अथर्ववेद (कांड 11)
अ॒भिवृ॑ष्टा॒ ओष॑धयः प्रा॒णेन॒ सम॑वादिरन् । आयु॒र्वै नः॒ प्राती॑तरः॒ सर्वा॑ नः सुर॒भीर॑कः ॥ (६)
प्राण अर्थात् सूर्य देव के द्वारा वर्षा के जल से सींची गई फसलें और जड़ीबूटियां सूर्य से संभाषण करने लगती हैं-“हे प्राण अर्थात् सूर्य देव! तुम हमारा जीवन बढ़ाओ तथा हमें शोभन गंध वाली बनाओ.” (६)
The crops and herbs grown by prana i.e. sun god with rain water begin to communicate with the sun - "O Prana means sun god! You enhance our lives and make us smell beautiful." (6)
अथर्ववेद (कांड 11)
नम॑स्ते अस्त्वाय॒ते नमो॑ अस्तु पराय॒ते । नम॑स्ते प्राण॒ तिष्ठ॑त॒ आसी॑नायो॒त ते॒ नमः॑ ॥ (७)
हे प्राण देव! तुझ आते हुए को नमस्कार है और वापस जाते हुए को नमस्कार है. हे प्राण देव! तुझ स्थिर रहने वाले को तथा बैठे हुए को नमस्कार है. (७)
O Life God! Salutations to the one who comes and salutations to those who go back. O Life God! Salutations to those who are still and to those who are sitting. (7)
अथर्ववेद (कांड 11)
नम॑स्ते प्राण प्राण॒ते नमो॑ अस्त्वपान॒ते । प॑रा॒चीना॑य ते॒ नमः॑ प्रती॒चीना॑य ते॒ नमः॒ सर्व॑स्मै त इ॒दं नमः॑ ॥ (८)
हे प्राण देव! सांस लेने का व्यापार करने वाले तुम्हें नमस्कार है तथा अपान वायु छोड़ने वाले तुम्हें नमस्कार है. अधिक कहने से क्या लाभ है, समस्त व्यापार अर्थात् क्रियाएं करने वाले तुम्हें नमस्कार है. (८)
O Life God! Salutations to those who do the business of breathing and salutations to those who leave your air. What is the benefit of saying more, salutations to you who do all the business i.e. actions. (8)