अथर्ववेद (कांड 11)
यो अ॒स्य स॒र्वज॑न्मन॒ ईशे॒ सर्व॑स्य॒ चेष्ट॑तः । अत॑न्द्रो॒ ब्रह्म॑णा॒ धीरः॑ प्रा॒णो मानु॑ तिष्ठतु ॥ (२४)
वह जगदीश्वर प्राण आलस्य रहित सदा सूर्य के रूप में विचरण करने वाला, ज्ञानवान एवं सर्वव्यापक होने के कारण मेरा अनुवर्तन करे. (२४)
That Jagdishwar prana should follow me because he is always moving in the form of the sun without laziness, being knowledgeable and omnipresent. (24)