अथर्ववेद (कांड 11)
चक्षुः॒ श्रोत्रं॒ यशो॑ अ॒स्मासु॑ धे॒ह्यन्नं॒ रेतो॒ लोहि॑तमु॒दर॑म् ॥ (२५)
हे ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म! हम स्तोत्राओं में चक्षु, क्षेत्र अर्थात् यज्ञ को धारण करो. तुम अन्न, वीर्य, रक्त तथा संपूर्ण शरीर को हम में धारण करो. (२५)
O Brahmachari Brahman! We should wear the eye, the area i.e. yajna in the stotras. You should hold food, semen, blood and the whole body in us. (25)